11 अक्टूबर से शुरू होंगे नवरात्र, 20 अक्टूबर को विजयादशमी
शारदीय नवरात्र का पर्व इस वर्ष 11 अक्टूबर 2026, रविवार से प्रारंभ होगा और 20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को विजयादशमी के साथ संपन्न होगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार 20 अक्टूबर को प्रातः 9:34 बजे के बाद दशमी तिथि प्रारंभ होने के पश्चात दशमी पूजन, जयंती ग्रहण, अपराजिता पूजन, शमी पूजन, देवी विसर्जन तथा नवरात्र व्रत का पारण करना श्रेष्ठ माना गया है।
इस वर्ष मां भगवती का आगमन गज (हाथी) पर और गमन भी गज वाहन से बताया गया है। नवरात्र में देवी के आगमन और प्रस्थान के वाहन का विशेष धार्मिक एवं ज्योतिषीय महत्व माना जाता है। मान्यता है कि देवी जिस वाहन पर पृथ्वी पर आती हैं और जिस वाहन से प्रस्थान करती हैं, उसका प्रकृति एवं जनजीवन पर विशेष प्रभाव पड़ता है।
गज वाहन पर देवी का आगमन
देवी भागवत पुराण में नवरात्र के दौरान भगवती के आगमन और गमन के वाहनों का उल्लेख मिलता है। इस वर्ष रविवार से नवरात्र प्रारंभ होने के कारण देवी के गज वाहन पर आगमन की मान्यता है। परंपरागत श्लोक के अनुसार गज वाहन पर देवी के आगमन को वर्षा, अन्न-धन की प्राप्ति तथा सुख-समृद्धि से जोड़ा गया है।
वहीं देवी के गज वाहन से गमन के संबंध में भी शास्त्रों में विशेष संकेत मिलते हैं। इस वर्ष मंगलवार के दिन मध्याह्न में विजयादशमी होने के कारण देवी के गज वाहन से गमन की मान्यता बताई गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गज वाहन को शुभ एवं समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
नवरात्र में देवी के वाहन का महत्व
नवरात्र के दौरान देवी के आगमन और गमन के वाहन को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्सुकता रहती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार अलग-अलग दिनों में देवी के विभिन्न वाहनों पर आगमन का अलग-अलग फल बताया गया है। रविवार और सोमवार को देवी के आगमन को भैंसा वाहन से जोड़ा जाता है, जिससे रोग और शोक की वृद्धि की मान्यता है। शनिवार और मंगलवार को घोड़े का वाहन माना जाता है, जिसे विकलता एवं अशांति से जोड़ा गया है। बुधवार और शुक्रवार को हाथी का वाहन वर्षा वृद्धि का संकेत माना जाता है, जबकि गुरुवार को मनुष्य की सवारी को सुख-सौभाग्य में वृद्धि का प्रतीक बताया गया है।
इस बार मां भगवती का हाथी पर आगमन जनमानस के लिए शुभ माना जा रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार हाथी पर देवी के आगमन से जल, वर्षा और अन्न-धन की प्राप्ति तथा विभिन्न प्रकार के रोग-शोक से राहत की कामना की जाती है।
शारदीय नवरात्र के दस दिनों का क्रम
11 अक्टूबर, रविवार – कलश स्थापना एवं मां शैलपुत्री पूजन
12 अक्टूबर, सोमवार – द्वितीय दिन ब्रह्मचारिणी पूजन
13 अक्टूबर, मंगलवार – तृतीय दिन चंद्रघंटा पूजन
14 अक्टूबर, बुधवार – चतुर्थ दिन कूष्मांडा पूजन
15 अक्टूबर, गुरुवार – पंचमी स्कंदमाता पूजन
16 अक्टूबर, शुक्रवार – षष्ठी कात्यायनी पूजन
17 अक्टूबर, शनिवार – सप्तमी कालरात्रि पूजन, डोली यात्रा एवं नवपत्रिका पूजन
18 अक्टूबर, रविवार – महाष्टमी व्रत, महागौरी पूजन, कुमारिका पूजन एवं महानिशा पूजन
19 अक्टूबर, सोमवार – महानवमी व्रत, दुर्ग नवमी एवं नवरात्र हवन
20 अक्टूबर, मंगलवार – दशमी पूजन, विजयादशमी, शमी पूजन, अपराजिता पूजन, जयंती ग्रहण, सरस्वती विसर्जन एवं व्रत पारण
पूजा के शुभ मुहूर्त
इस वर्ष सौभाग्य प्रदाता माता के पूजन के लिए 11 अक्टूबर को प्रातः 6:31 बजे से सायं 5 बजे तक चित्रा नक्षत्र में वैधृति योग के संयोग को शुभ बताया गया है।
कलश स्थापना के लिए विशेष शुभ मुहूर्त पूर्वाह्न 11:35 बजे से मध्याह्न 12:24 बजे तक अभिजीत मुहूर्त में बताया गया है।
वहीं 20 अक्टूबर को प्रातः 9:40 बजे से श्रवण नक्षत्र में उच्ची ग्रहों और सरस्वती विसर्जन का समय बताया गया है। मध्याह्न व्यापिनी विजयादशमी में पूर्वाह्न 10 बजे से 11:45 बजे तक का समय शुभ एवं प्रसन्नतादायक माना गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्र के दौरान विधि-विधान से मां भगवती की पूजा-अर्चना करने से श्रद्धालुओं को सुख, शांति, समृद्धि एवं मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। नवरात्र केवल धार्मिक अनुष्ठान का पर्व ही नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, साधना और सकारात्मक ऊर्जा का भी अवसर माना जाता है।
स्रोत/ज्योतिषीय मार्गदर्शन:
आचार्य मंजीत पाण्डेय
(ज्योतिषप्रवीण, कर्मकाण्ड मर्मज्ञ)
सिद्धेश्वर ज्योतिष संस्थान एवं परामर्श केंद्र, श्री सच्चा बाबा आश्रम, संगम तट, अरैल, नैनी, प्रयागराज
मो.: 8521830811
