अज्ञात तिथि वाले पितरों का श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या पर करने से पितरों का स्मरण एवं तर्पण पूर्ण होता है।
सनातन धर्म में पितृ पक्ष का विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व माना गया है। यह पक्ष अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता, तर्पण एवं स्मरण का पावन अवसर है। मान्यता है कि पितृ पक्ष के दौरान पितृ अपने वंशजों के समीप आते हैं और श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान तथा श्रद्धापूर्वक किए गए धार्मिक कर्मों से प्रसन्न होकर परिवार को सुख-समृद्धि, आरोग्य एवं मंगलमय जीवन का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं ज्योतिषाचार्य महंत रोहित शास्त्री ने बताया कि इस वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या, पितृ विसर्जन अमावस्या, सर्वपितृ श्राद्ध एवं श्राद्ध पक्ष का समापन 10 अक्तूबर 2026, शनिवार को होगा। यह दिन उन सभी पितरों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है अथवा जिनका श्राद्ध किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर नहीं किया जा सका।
महंत रोहित शास्त्री ने कहा कि जिस तिथि को किसी परिजन का देहांत हुआ हो, उसी तिथि को पितृ पक्ष में उनका श्राद्ध करना शास्त्रसम्मत परंपरा मानी जाती है। लेकिन यदि किसी व्यक्ति को अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो ऐसे पितरों का श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या के दिन किया जाता है। इसी कारण पितृ विसर्जन अमावस्या को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
पितृ विसर्जन का धार्मिक महत्व
महंत रोहित शास्त्री ने कहा कि पितृ विसर्जन अमावस्या केवल श्राद्ध पक्ष की समाप्ति का दिन नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और पारिवारिक संस्कारों को स्मरण करने का अवसर भी है। इस दिन विधिपूर्वक श्राद्ध एवं तर्पण करने के साथ पितरों से परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिए आशीर्वाद की प्रार्थना करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि पितरों के प्रति श्रद्धा केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनके संस्कारों, आदर्शों और जीवन मूल्यों को आगे बढ़ाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
इस प्रकार करें पितृ विसर्जन
सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रद्धालु प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण एवं पूजन करें। अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण भोजन एवं जरूरतमंदों को भोजन करवाकर दक्षिणा, वस्त्र अथवा अन्य आवश्यक सामग्री का दान करना भी पुण्यकारी माना गया है।
श्राद्ध कर्म के दौरान देवता, पितरों, गौ माता, कौवे, कुत्ते और चींटियों के लिए भोजन का कुछ अंश श्रद्धापूर्वक अलग निकालने की परंपरा है। इसके पश्चात ब्राह्मणों एवं जरूरतमंद लोगों को भोजन करवाकर उनका सम्मान करना चाहिए।
मुख्य द्वार पर दीप प्रज्वलित करने की परंपरा
महंत रोहित शास्त्री ने बताया कि पितृ विसर्जन अमावस्या की संध्या को घर के मुख्य द्वार पर श्रद्धापूर्वक दो-दो पूड़ियां, भोजन, चावल, फल, मिठाई, पुष्प एवं दक्षिणा आदि दोनों ओर रखे जा सकते हैं। इनके ऊपर सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित करने की परंपरा है।
उन्होंने कहा कि दीप प्रज्वलित करने का भाव यह है कि पितृ अपने लोक की ओर प्रस्थान करते समय अंधकार में न जाएं और उनका मार्ग प्रकाशमय हो। इस अवसर पर परिवार के सभी सदस्य श्रद्धापूर्वक पितरों का स्मरण करते हुए प्रार्थना करें—
“हे हमारे पितृगण! आपने हमारे परिवार को जो संस्कार, परंपराएं और जीवन-मूल्य प्रदान किए हैं, उनके लिए हम सदैव आपके प्रति कृतज्ञ हैं। आप हम सभी पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें और सुख-शांति एवं समृद्धि प्रदान करें। पितृ पक्ष की समाप्ति पर आप अपने लोक को प्रस्थान करें और अपने आशीर्वाद से हमारे परिवार को सदैव मंगलमय रखें।”
महंत रोहित शास्त्री ने कहा कि इस दिन श्रद्धा, सामर्थ्य और शुद्ध भाव से किया गया श्राद्ध एवं तर्पण पितरों के प्रति सम्मान प्रकट करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि पितृ विसर्जन अमावस्या के अवसर पर अपने पूर्वजों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करें, जरूरतमंदों की सहायता करें तथा सनातन धर्म की इस महान परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं।
महंत रोहित शास्त्री (ज्योतिषाचार्य)
प्रधान, श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट (पंजीकृत)
रायपुर ठठर, जम्मू-कश्मीर
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