–जुगुल किशोर तिवारी बुन्देला
किसी भी लोकतंत्र में स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक मीडिया को चौथा स्तंभ माना जाता है। यदि मीडिया की विश्वसनीयता और स्वतंत्रता पर प्रश्न उठने लगें, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय बन जाता है।
आज यह धारणा व्यापक रूप से व्यक्त की जाती है कि मुख्यधारा का मीडिया दो धड़ों में बंटता दिखाई देता है। एक वर्ग ऐसा माना जाता है जो सरकार से अपेक्षाकृत कम प्रश्न करता है, जबकि विपक्ष से अधिक प्रश्न पूछता है। इस स्थिति के पीछे सरकारी विज्ञापनों पर निर्भरता, व्यावसायिक हित अथवा सरकारी एजेंसियों की कार्रवाई का भय जैसे कारण बताए जाते हैं। आलोचक ऐसे मीडिया को “गोदी मीडिया” जैसे शब्दों से संबोधित करते हैं।
उदाहरण के रूप में, यूजीसी रेगुलेशन के विरोध में 8 मार्च 2026 से चल रहे आंदोलन को पर्याप्त कवरेज न मिलने का आरोप भी लगाया जाता है। ऐसे उदाहरणों के आधार पर कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि भारत में मीडिया की स्वतंत्रता और विविधता पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता है।
दूसरी ओर, स्वतंत्र डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया मंचों, स्वतंत्र पत्रकारों और यूट्यूब आधारित पत्रकारिता ने विशेषकर युवाओं के बीच अपनी अलग पहचान और विश्वसनीयता बनाई है। इनके समर्थकों का मानना है कि यह माध्यम अपेक्षाकृत कम संस्थागत दबाव में काम करते हैं और जनता की आवाज़ को सीधे सामने लाने का प्रयास करते हैं। साथ ही इनकी आय का बड़ा हिस्सा दर्शकों के सहयोग, सदस्यता और डिजिटल विज्ञापनों पर आधारित होता है।
यद्यपि स्वतंत्र मीडिया भी निष्पक्षता, तथ्य-जांच और उत्तरदायित्व के समान मानकों का पालन करने के लिए उत्तरदायी है, फिर भी आज अनेक नागरिकों का विश्वास है कि सोशल मीडिया, स्वतंत्र पत्रकार और यूट्यूबर लोकतंत्र में जनमत को सामने लाने तथा सत्ता से प्रश्न पूछने की महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
लोकतंत्र तभी सशक्त होगा जब हर प्रकार का मीडिया—चाहे वह मुख्यधारा का हो या स्वतंत्र—तथ्यों, निष्पक्षता और जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।
