श्रीमहाशिवरात्रि – 15 फरवरी 2026, रविवार, अपनी राशि के अनुसार शिव पूजा, दान एवं मंत्र जप करें
शिव की आराधना इच्छा-शक्ति को मजबूत करती है और अंतःकरण में अदम्य साहस व दृढ़ता का संचार करती है।
फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन श्रीमहाशिवरात्रि मनाई जाती है। महाशिवरात्रि शिव भक्तों के लिए विशेष महत्व रखती है। श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट के अध्यक्ष (ज्योतिषाचार्य) महंत रोहित शास्त्री ने महाशिवरात्रि के विषय में बताया कि शिवभक्तों का सबसे बड़ा त्योहार महाशिवरात्रि है। इस त्योहार का भक्तगण पूरे वर्ष इंतजार करते हैं और महाशिवरात्रि के दिन सुबह से ही शिव मंदिरों में जुटने लगते हैं। वर्ष 2026 में महाशिवरात्रि का पर्व 15 फरवरी, रविवार को मनाया जाएगा। ज्योतिष शास्त्र के दृष्टिकोण से शिवरात्रि पर्व चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान भोलेनाथ अर्थात स्वयं शिव हैं। इसलिए प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। परंतु उन सभी में सबसे महत्वपूर्ण फाल्गुन कृष्ण पक्ष की महाशिवरात्रि होती है। भगवान शिव को चतुर्दशी तिथि का स्वामी माना गया है। शास्त्रों में वर्णित है कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के पावन दिन भगवान शिव अनंत ज्योतिर्लिंग स्वरूप में प्रकट हुए थे। ईशान संहिता में उल्लेख मिलता है कि यह वही दिव्य रात्रि थी जब निराकार ब्रह्म ने स्वयं को ज्योति-स्वरूप में प्रकट कर सृष्टि को अपने अस्तित्व का बोध कराया। तभी से यह तिथि महाशिवरात्रि के रूप में पूजनीय और वंदनीय बन गई।
महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सृष्टि के आदि और अनादि तत्व — शिव — के प्राकट्य का उत्सव है। यह वह रात्रि है जब साधक जागरण कर अपने भीतर की अज्ञानता को समाप्त कर शिवत्व की ओर अग्रसर होता है।
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, इसी दिन समुद्र मंथन हुआ था। देवताओं और दैत्यों द्वारा अमृत की प्राप्ति के लिए किए गए इस महा-मंथन से सर्वप्रथम भयंकर कालकूट विष निकला। उस विष की ज्वाला से संपूर्ण सृष्टि संतप्त होने लगी। तब करुणामूर्ति भगवान शिव ने समस्त प्राणियों की रक्षा हेतु वह घातक विष अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला हो गया और तभी से वे नीलकंठ कहलाए। यह घटना त्याग, करुणा और विश्व-कल्याण की परम पराकाष्ठा का प्रतीक है।
अन्य मान्यताओं के अनुसार, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की यही रात्रि भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह का मंगल अवसर भी है। अतः यह पर्व शिव–शक्ति के पावन मिलन का उत्सव भी माना जाता है। शिव बिना शक्ति अधूरे हैं और शक्ति बिना शिव निरर्थक — महाशिवरात्रि इस अद्वैत सत्य का स्मरण कराती है।हालाँकि, कुछ मान्यताओं और पुराणों के अनुसार, विवाह का मुख्य उत्सव या शुभ मुहूर्त वैशाख शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को भी माना जाता है, जब शिव-पार्वती परिणय सूत्र में बंधे थे। ज्योतिष शास्त्रों में इस तिथि को अत्यंत शुभ बताया गया है।
फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी, रविवार को सायं 05:05 बजे से प्रारंभ होकर 16 फरवरी, सोमवार को सायं 05:35 बजे तक रहेगी। महाशिवरात्रि की पूजा निशीथ काल में की जाती है, इसलिए इस वर्ष महाशिवरात्रि का पर्व 15 फरवरी, रविवार को मनाना उचित होगा। निशीथ काल पूजा मुहूर्त : रात्रि 12:07 से 12:57 तक ,व्रत पारण समय (16 फरवरी 2026, सोमवार):
प्रातः 06:35 से दोपहर 03:03 बजे तक
रात्रि के चार प्रहरों की पूजा
प्रथम प्रहर: सायं 6:22 से 9:27 तक
द्वितीय प्रहर: रात्रि 9:29 से 12:30 तक
तृतीय प्रहर: रात्रि 12:31 से 03:31 तक
चतुर्थ प्रहर: प्रातः 03:31 से 06:33 तक
भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार एक से चार बार तक पूजन कर सकते हैं।
पूजन सामग्री
गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, पुष्प, शुद्ध वस्त्र, बिल्व पत्र, धूप, दीप, नैवेद्य, चंदन लेप, ऋतु फल, आक-धतूरे के पुष्प, चावल आदि शिवलिंग पर अर्पित करें।
महाशिवरात्रि के दिन शिवपुराण पाठ, रुद्राभिषेक, शिव कथा, शिव स्तोत्र एवं “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करते हुए रात्रि जागरण करने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। महंत रोहित शास्त्री के अनुसार महाशिवरात्रि का व्रत मोक्ष प्रदान करने वाला है तथा शिव पूजा समस्त पापों का क्षय करती है।
महिलाओं के लिए विशेष महत्व
अविवाहित महिलाएं भगवान शिव से उत्तम वर की प्राप्ति हेतु प्रार्थना करती हैं। विवाहित महिलाएं अपने पति और परिवार की मंगलकामना हेतु व्रत रखती हैं।
व्रत विधि
प्रातः स्नान कर भस्म का तिलक लगाएं और रुद्राक्ष की माला धारण करें। दिनभर उपवास रखकर भगवान शिव का ध्यान करें। यदि शिव मंदिर में पूजन संभव न हो तो घर में किसी शांत स्थान पर पूजन और जप किया जा सकता है।
विशेष ध्यान दें:
भोलेनाथ पर चढ़ाया गया प्रसाद सामान्यतः ग्रहण नहीं करना चाहिए। यदि शिव मूर्ति के पास शालिग्राम स्थापित हो, तो प्रसाद ग्रहण करने में कोई दोष नहीं होता।
राशि अनुसार शिव पूजा
महाशिवरात्रि, प्रतिदिन या प्रत्येक सोमवार को श्रद्धा से करने पर शिव भक्तों को उत्तम लाभ और संतोष की प्राप्ति होती है।
मेष राशि : जल में गुड़, गन्ने का रस या शहद मिलाकर अभिषेक करें। लाल चंदन से तिलक लगाएं। बेलपत्र पर “ॐ नमः शिवाय” लिखकर अर्पित करें। लाल पुष्प चढ़ाएं। 11 ब्राह्मणों को शिवपुराण दान दें।
वृष राशि : गाय के दूध और दही से अभिषेक करें। चावल, सफेद चंदन, सफेद आक, सफेद वस्त्र और चमेली के फूल चढ़ाएं। महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। 11 वेदपाठी ब्राह्मणों को रुद्राक्ष माला दान दें।
मिथुन राशि : गन्ने के रस से रुद्राभिषेक करें। बेलपत्र, शमी पत्र, साबुत हरे मूंग, भांग, दूर्वा और कुश अर्पित करें। शिव चालीसा का पाठ करें तथा 11 शिव चालीसा अर्पित करें।
कर्क राशि : दूध, दही और घी से अभिषेक करें। सफेद चंदन तिलक, अक्षत, सफेद गुलाब और शंखपुष्पी चढ़ाएं। शिवाष्टक के 11 पाठ करें। सफेद वस्त्र दान करें।
सिंह राशि : जल में गुड़, लाल चंदन और शहद मिलाकर अभिषेक करें। लाल पुष्प चढ़ाएं। गुड़-चावल की खीर का प्रसाद बांटें। शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ करें। कमलगट्टे की 11 माला दान करें।
कन्या राशि :गन्ने के रस से रुद्राभिषेक करें। बेलपत्र, धतूरा, भांग और दूर्वा चढ़ाएं। शिवपुराण कथा का श्रवण करें।
तुला राशि : दही, घी, दूध और सुगंधित इत्र से अभिषेक करें। सफेद चंदन तिलक लगाएं। मिश्री और खीर का भोग लगाएं। सफेद वस्त्र दान करें। शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करें।
वृश्चिक राशि : जल में गुड़, लाल चंदन और शहद मिलाकर तथा पंचामृत से अभिषेक करें। केसर और लाल पुष्प अर्पित करें। लाल हलवे का भोग लगाएं। भगवान शिव के 1000 नामों का स्मरण करें।
धनु राशि : दूध में केसर, हल्दी और शहद मिलाकर अभिषेक करें। पीले चंदन का तिलक लगाएं। पीले पुष्प अर्पित करें। पीले वस्त्र दान करें। शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ करें।
मकर राशि : जल में दूध या गेहूं मिलाकर अर्पित करें। तिल का तेल और नीले पुष्प चढ़ाएं। नीले वस्त्र दान करें। भगवान शिव के 108 नामों का स्मरण करें।
कुम्भ राशि : नारियल जल या तिल तेल से रुद्राभिषेक करें। शमी पुष्प अर्पित करें। शिवाष्टक का पाठ करें।
मीन राशि : केसर मिश्रित जल से अभिषेक करें। पंचामृत, दही, दूध और पीले पुष्प अर्पित करें। “ॐ नमः शिवाय” का जप करें। शिव चालीसा का पाठ करें।
भगवान शिव की आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥
दो भुज, चार चतुर्भुज, दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥
अक्षमाला, वनमाला, मुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी, कंसारी, कर माला धारी॥
श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघम्बर अंगे।
सनकादिक, गरुणादिक, भूतादिक संगे॥
कर के मध्य कमण्डलु, चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी, दुखहारी, जगपालनकारी॥
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव जानत अविवेका।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।
पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग-धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥
काशी में विराजे विश्वनाथ, नंदी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

महंत रोहित शास्त्री (स्टेट अवॉर्डी)
अध्यक्ष श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट, रायपुर, ठठर, जम्मू कश्मीर।
संपर्क सूत्र 7006711011,9858293195.
