प्रयागराज की पवित्र धरती से पिछले दिनों जन सामान्य मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष, आईपीएस पंडित जुगल किशोर तिवारी जी ने* एक सभा को संबोधित करते हुए देश में जाति के नाम पर हो रहे विभाजन, सामाजिक विखंडन और राजनीतिक षड्यंत्रों पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने बिना किसी भय, दबाव या संकोच के अत्यंत स्पष्ट और तथ्यपूर्ण शब्दों में अपनी बात रखी तथा समाज को जाग्रत और प्रेरित किया।
अपने ओजस्वी संबोधन में पंडित जुगल किशोर तिवारी जी ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने समाज को केवल लिखित पुस्तकों पर नहीं छोड़ा, बल्कि संस्कारों के माध्यम से जीवन में उतारा। उन्होंने बताया कि शिखा, जनेऊ और तिलक केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि हिंदू पहचान और सामाजिक अनुशासन* के सूत्र हैं। पूर्वज यह जानते थे कि आने वाले समय में लोग पढ़ने से अधिक देखने और सुनने में विश्वास करेंगे, इसलिए इन प्रतीकों को जीवन का अभिन्न अंग बनाया गया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वे किसी एक जाति की नहीं, बल्कि *सम्पूर्ण हिंदू समाज और पूरे राष्ट्र* की बात करते हैं। उन्होंने समाज से आग्रह किया कि तिलक धारण जैसे छोटे-से संकल्प से भी बड़े परिवर्तन संभव हैं। केवल सात दिनों में समाज का परिवेश बदल सकता है—शर्त यह है कि हम स्वयं से शुरुआत करें और संकोच त्यागें।
पंडित जी ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज हिंदू समाज अपनी पहचान को भूलता जा रहा है। जो लोग तिलक, शिखा या संस्कारों को देखकर भेदभाव करते हैं, उन्हें शास्त्रसम्मत और तर्कपूर्ण उत्तर देना चाहिए।
कुछ लोग कहते हैं—
“ये तो पंडितों का काम है।”
तो उन्हें स्पष्ट बताइए—
यदि ब्राह्मण बिना तिलक के दिखे
तो देखने वाले को शास्त्रानुसार दोष लगता है,
और ब्राह्मण तिलक इसलिए लगाता है
ताकि दूसरों को दोष न लगे।
यह अहंकार नहीं, उपकार है।
यह विषय जाति का नहीं है,
यह सम्पूर्ण हिंदू समाज का है।
आज हिंदू इसलिए भ्रमित है
क्योंकि उसे उसकी पहचान से काट दिया गया है।
उन्होंने यह भी समझाया कि यह सब किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि समाज की रक्षा और संतुलन के लिए है।
अपने संबोधन में उन्होंने संविधान निर्माण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए बताया कि संविधान केवल किसी एक व्यक्ति की देन नहीं, बल्कि *लगभग 289 विद्वानों की सामूहिक रचना है, जिनमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद, बी.एन. राव जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वान शामिल थे।* उन्होंने स्पष्ट कहा कि संविधान की आड़ लेकर समाज को तोड़ने वालों और ऐसे राजनीतिक दलों या नेताओं का समर्थन अब नहीं किया जाना चाहिए।
*पंडित जुगल किशोर तिवारी जी ने सभा से स्पष्ट राजनीतिक संकल्प लेने का आह्वान किया—कि जो भी नेता या दल समाज को विभाजित करेगा, चाहे वह कितना ही निकट संबंधी क्यों न हो, उसे वोट नहीं दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि विकल्प तभी पैदा होगा जब समाज स्वयं नेतृत्व करेगा। हर व्यक्ति में 50, 100 या 1000 लोगों का नेतृत्व करने की क्षमता है—बस संकल्प की आवश्यकता है।
उन्होंने यह भी बताया कि यह आंदोलन किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। ओबीसी वर्ग, भीम सेना और अन्य सामाजिक संगठनों के जिम्मेदार लोगों ने भी इन मुद्दों पर समर्थन दिया है। यह संघर्ष सामाजिक न्याय, राष्ट्रहित और समरसता के लिए है।
सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे जातिगत और घृणात्मक प्रचार पर बोलते हुए उन्होंने तीन स्पष्ट उपाय बताए—
1. ऐसे लोगों को नजरअंदाज करना,
2. उनकी पोस्ट को रिपोर्ट करना,
3. किसी एक व्यक्ति की गलती के लिए पूरी जाति को निशाना न बनाना।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि जन सामान्य मंच किसी जाति का पक्ष नहीं लेता, बल्कि देश और समाज के पक्ष में खड़ा है। मंच पर बैठे लोग किसी जाति विशेष के कारण नेता नहीं बने, बल्कि विचार, कर्म और राष्ट्रचिंता के कारण आगे आए हैं।
*पंडित जुगल किशोर तिवारी जी का यह संबोधन केवल भाषण नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाला घोषणापत्र था।
उनकी निर्भीकता, वैचारिक स्पष्टता और राष्ट्र के प्रति निष्ठा उन्हें आज के समय का एक दुर्लभ, सशक्त और विश्वसनीय नेतृत्वकर्ता बनाती है। जन सामान्य मंच उनके नेतृत्व में केवल संगठन नहीं, बल्कि समाज जागरण का आंदोलन बनता जा रहा है।
