कभी पत्रकारिता को मिशन कहा जाता था। तब पत्रकारिता का उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करना, सत्ता से सवाल पूछना और जनहित की आवाज को मंच देना माना जाता था। पत्रकार अपने पेशे को लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में देखता था। उसके सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह होता था कि खबर में जनहित कितना है।
समय बदला। पत्रकारिता मिशन से पेशा बनी। यह परिवर्तन अपने आप में अस्वाभाविक नहीं था। पत्रकार भी समाज का हिस्सा है और उसके श्रम का आर्थिक मूल्य होना चाहिए। समाचार संस्थानों का विस्तार हुआ, तकनीक आई, विज्ञापन बढ़े और पत्रकारिता एक व्यवस्थित उद्योग का रूप लेने लगी। लेकिन इसी यात्रा में कहीं-कहीं खबर और बाजार के बीच की दूरी भी कम होती चली गई।
अब पत्रकारिता के सामने एक नई चुनौती दिखाई दे रही है—कॉन्क्लेव संस्कृति।
आज किसी विषय पर चर्चा के नाम पर बड़े-बड़े मंच सजते हैं। मंच पर प्रसिद्ध चेहरे होते हैं, आकर्षक बैकड्रॉप होता है, प्रायोजक होते हैं, कैमरे होते हैं और सोशल मीडिया के लिए तैयार सामग्री भी। विषय चाहे शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो, उद्योग हो, राजनीति हो, संस्कृति हो या विकास—हर क्षेत्र का अपना कॉन्क्लेव दिखाई देने लगा है।
कॉन्क्लेव करना अपने आप में गलत नहीं है। गंभीर विमर्श के लिए संवाद के मंच आवश्यक हैं। समस्या तब पैदा होती है जब विमर्श से अधिक महत्वपूर्ण मंच हो जाए और विचार से अधिक महत्वपूर्ण आयोजन।
कभी पत्रकार सवाल लेकर सत्ता के दरवाजे तक जाता था। अब कई बार सत्ता, उद्योग और प्रभावशाली लोगों को मंच पर बुलाकर उसी पत्रकारिता संस्थान के आयोजन में सम्मानित किया जाता है। सवाल यह नहीं कि सम्मान क्यों दिया गया, बल्कि सवाल यह है कि सम्मान और पत्रकारिता के बीच की सीमा कितनी स्पष्ट है?
कॉन्क्लेव में अक्सर वक्ताओं की सूची ही कार्यक्रम की सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाती है। कौन आया, किसने भाषण दिया, किसे सम्मान मिला और मंच की तस्वीर कितनी बड़ी बनी—यह सब खबर बन जाता है। लेकिन जिस विषय पर कॉन्क्लेव आयोजित हुआ, उस पर वास्तव में क्या निष्कर्ष निकला, कौन-सी नीति बदलेगी, कौन-सी समस्या का समाधान होगा और जनता को इससे क्या मिलेगा—इन प्रश्नों का उत्तर कई बार कार्यक्रम समाप्त होने के साथ ही समाप्त हो जाता है।
यहां पत्रकारिता के मूल चरित्र पर विचार करना जरूरी है।
पत्रकारिता का काम केवल आयोजन करना नहीं, बल्कि सवाल पैदा करना भी है। पत्रकारिता का मूल्य इस बात से तय नहीं होना चाहिए कि उसके मंच पर कितने बड़े लोग आए, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि उसने समाज के कितने जरूरी प्रश्नों को सामने रखा।
कॉन्क्लेव की बढ़ती संस्कृति का एक दूसरा पहलू भी है। आज मीडिया संस्थानों के सामने आर्थिक चुनौतियां हैं। विज्ञापन का स्वरूप बदला है, डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पारंपरिक आय मॉडल को प्रभावित किया है और प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। ऐसे में आयोजनों के माध्यम से राजस्व जुटाना एक व्यावसायिक रणनीति हो सकती है। लेकिन यहां भी संपादकीय स्वतंत्रता और व्यावसायिक हितों के बीच स्पष्ट रेखा जरूरी है।
यदि किसी कार्यक्रम का प्रायोजक ही चर्चा का विषय तय करने लगे, वक्ताओं का चयन प्रभावित करने लगे या किसी संस्था अथवा व्यक्ति की आलोचना से बचने का दबाव बनने लगे, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह पत्रकारिता का मंच है या जनसंपर्क का मंच?
पत्रकारिता और इवेंट मैनेजमेंट में अंतर होना चाहिए।
इवेंट मैनेजमेंट का उद्देश्य कार्यक्रम को सफल बनाना है—अच्छा मंच, अच्छी व्यवस्था, प्रभावशाली अतिथि और व्यापक दृश्यता। पत्रकारिता का उद्देश्य इससे आगे है—सत्ता से प्रश्न, तथ्यों की जांच, विरोधाभासी पक्षों को सामने रखना और जनता के हित को प्राथमिकता देना।
दोनों एक साथ चल सकते हैं, लेकिन एक-दूसरे का स्थान नहीं ले सकते।
आज आवश्यकता कॉन्क्लेव बंद करने की नहीं, बल्कि कॉन्क्लेव को सार्थक बनाने की है। यदि किसी सम्मेलन में किसान, मजदूर, विद्यार्थी, शिक्षक, छोटे व्यापारी, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक की वास्तविक समस्याएं भी उतनी ही गंभीरता से सुनी जाएं जितनी किसी बड़े उद्योगपति या राजनेता की बात सुनी जाती है, तो वह आयोजन पत्रकारिता के मूल उद्देश्य को मजबूत कर सकता है।
हर कॉन्क्लेव के बाद यह पूछा जाना चाहिए—इससे क्या निकला? कौन-सी बात सामने आई? किस समस्या पर आगे काम होगा? क्या कोई ठोस सुझाव बना? क्या संबंधित संस्थाओं ने कोई प्रतिबद्धता जताई? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या आम आदमी की जिंदगी में इससे कोई फर्क पड़ेगा?
पत्रकारिता को मंचों की चमक से नहीं, सवालों की धार से अपनी पहचान बनानी होगी।
मिशन से पेशा बनने तक पत्रकारिता ने समय के अनेक पड़ाव देखे हैं। अब वह कॉन्क्लेव के दौर में प्रवेश कर रही है। यह दौर पत्रकारिता के लिए अवसर भी हो सकता है और आत्ममंथन का क्षण भी।
क्योंकि अंततः पत्रकारिता की पहचान उसके भव्य मंच से नहीं, उसके निर्भीक सवाल से होती है।
और यदि सवाल मंच की सजावट में कहीं खो गया, तो कॉन्क्लेव तो बचा रहेगा—लेकिन पत्रकारिता का मूल अर्थ धीरे-धीरे पीछे छूट सकता है।
