शारीरिक शुद्धता के साथ-साथ मन की पवित्रता का भी विशेष ध्यान रखें।
: पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत प्रत्येक वर्ष पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को श्रद्धा एवं विधि-विधान से रखा जाता है। इस व्रत के संबंध में श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत रोहित शास्त्री (ज्योतिषाचार्य) ने जानकारी देते हुए बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो दंपत्ति संतान की प्राप्ति की इच्छा रखते हैं अथवा अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं, उन्हें पुत्रदा एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस बार पौष पुत्रदा एकादशी को लेकर लोगों के मन में यह भ्रम बना हुआ है कि व्रत 30 दिसंबर को रखा जाए या 31 दिसंबर को। साथ ही, पारण के सही समय को लेकर भी श्रद्धालुओं में जिज्ञासा बनी हुई है। आइए जानते हैं पौष पुत्रदा एकादशी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त एवं पारण का समय।
इस वर्ष पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 30 दिसंबर, मंगलवार को प्रातः 07:52 बजे प्रारंभ होगी तथा 31 दिसंबर, बुधवार को प्रातः 05:01 बजे समाप्त होगी।
व्रत तिथि निर्धारण
• स्मार्त संप्रदाय (सामान्य गृहस्थी) के श्रद्धालु 30 दिसंबर, मंगलवार को व्रत रखें।
• वैष्णव संप्रदाय (सन्यासी) के श्रद्धालु 31 दिसंबर, बुधवार को व्रत रखें।
नोट : जिन श्रद्धालुओं ने स्मार्त संप्रदाय के गुरुओं से दीक्षा ली है, वे 30 दिसंबर को ही व्रत रखें।
जिन श्रद्धालुओं ने वैष्णव संप्रदाय के गुरुओं से दीक्षा ग्रहण की है, वे 31 दिसंबर को पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत रखें।
वैष्णव की परिभाषा : जिन भक्तों ने वैष्णव संप्रदाय के गुरुओं से दीक्षा ली हो तथा जो कंठी या तुलसी माला धारण करते हों अथवा मस्तक एवं गले पर चंदन, गोपी चंदन, श्रीखंड, त्रिपुण्ड्र, ऊर्ध्वपुण्ड्र या विष्णु-चरण आदि चिन्ह धारण करते हों—वे वैष्णव कहलाते हैं।
यदि जो श्रद्धालु 30 दिसंबर को एकादशी व्रत रखते हैं, तो वे 31 दिसंबर को दोपहर 1 बजकर 26 मिनट तक पारण कर सकते हैं। वहीं, जो भक्त 31 दिसंबर को व्रत करेंगे, वे 1 जनवरी 2026 को प्रातः 7 बजकर 14 मिनट से 9 बजकर 18 मिनट के बीच पारण कर सकते हैं।
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार सभी एकादशियों में पुत्रदा एकादशी का विशेष महत्व है। इस व्रत के प्रभाव से योग्य संतान की प्राप्ति होती है तथा इस दिन सृष्टि के पालनकर्ता भगवान श्रीहरि विष्णु की विशेष आराधना की जाती है।
एकादशी व्रत जीवन में संतुलन बनाए रखने की शिक्षा देता है। यह व्रत व्यक्ति को अर्थ और काम से ऊपर उठाकर धर्म के मार्ग पर अग्रसर करता है तथा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। यह व्रत पुरुष एवं महिलाएँ—दोनों कर सकते हैं।
व्रत निराहार अथवा फलाहार—दोनों प्रकार से रखा जा सकता है। संध्या समय भगवान विष्णु का पूजन कर फल ग्रहण किया जा सकता है। व्रत का पारण द्वादशी तिथि को किया जाता है। द्वादशी के दिन किसी ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराकर दान-दक्षिणा अवश्य दें।
शास्त्रों के अनुसार एकादशी के दिन चावल एवं सभी तामसिक वस्तुओं का सेवन वर्जित है। इस दिन मदिरा व अन्य नशीले पदार्थों से दूर रहना चाहिए, क्योंकि इनका प्रभाव शरीर के साथ-साथ भविष्य पर भी प्रतिकूल पड़ता है। सात्विक आहार का सेवन उत्तम माना गया है।
व्रत पूजन विधि
महंत रोहित शास्त्री ने बताया कि इस व्रत में शारीरिक शुद्धता के साथ-साथ मानसिक पवित्रता अत्यंत आवश्यक है। प्रातःकाल पति-पत्नी संयुक्त रूप से भगवान लक्ष्मीनारायण की उपासना करें। स्नान के पश्चात पूजा कक्ष अथवा घर के किसी शुद्ध स्थान पर स्वच्छ चौकी पर भगवान श्रीगणेश एवं भगवान लक्ष्मीनारायण की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें।
पूरे कक्ष एवं चौकी को गंगाजल अथवा गोमूत्र से शुद्ध करें। चौकी पर चांदी, तांबे अथवा मिट्टी के कलश में जल भरकर उस पर नारियल स्थापित करें। तत्पश्चात कलश में विराजमान देवी-देवताओं, नवग्रहों, तीर्थों, योगिनियों एवं नगर देवता की विधिवत पूजा करें।
इसके बाद व्रत का संकल्प लें और वैदिक मंत्रों एवं विष्णु सहस्रनाम के मंत्रों द्वारा भगवान लक्ष्मीनारायण सहित सभी स्थापित देवताओं की षोडशोपचार पूजा करें। अंत में संतान गोपाल मंत्र का जप करें, व्रत-कथा सुनें अथवा सुनाएँ और प्रसाद वितरण कर पूजन संपन्न करें।
महंत रोहित शास्त्री (ज्योतिषाचार्य)
अध्यक्ष — श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट (पंजीकृत)
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