– धर्मेंद्र चौधरी (सामाजिक चिंतक)
यमुना एक्सप्रेस‑वे पर घने कोहरे में हुआ यह हादसा सिर्फ़ एक समाचार नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक लापरवाही का कड़वा आईना है। माइलस्टोन‑127 के पास तड़के साढ़े चार बजे के आसपास सात बसों और तीन कारों की टक्कर, वाहनों में लगी भीषण आग, चौदह के करीब लोगों की मौत और दर्जनों घायल यह सब कुछ क्षण भर में घटित हो गया।
कुछ ही मिनटों में कई परिवारों की ज़िन्दगी हमेशा के लिए बदल गई, किसी का कमाने वाला चला गया, किसी माँ‑बाप ने अपने जवान बेटे को खो दिया, तो कहीं छोटे‑छोटे बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया।
सोचने वाली बात यह है कि इतनी घनी धुंध के बीच वाहन इतनी तेज़ रफ़्तार से क्यों दौड़ रहे थे। मौसम विभाग और ट्रैफिक पुलिस बार‑बार चेतावनी देती है कि कोहरे में गति कम रखिए, गाड़ियाँ आपस में पर्याप्त दूरी पर चलाइए, फिर भी हाईवे पर रेस लगाना मानो आदत बन गई है।
ड्राइवर को देर हो रही होती है, यात्री मंज़िल जल्दी पहुँचने की ज़िद करते हैं और मालिकों का दबाव अलग; नतीजा यह होता है कि ज़िन्दगी की गति हमेशा के लिए थम जाती है। कुछ लोगों की जल्दबाज़ी बाकी निर्दोष यात्रियों पर ऐसी सज़ा बनकर टूटती है, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।
इन हादसों के पीछे सिर्फ़ कोहरा दोषी नहीं है, हमारी मानसिकता भी उतनी ही ज़िम्मेदार है। सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ लगातार कहते हैं कि कोहरे में तेज़ रफ़्तार और लेन बदलना मौत को दावत देना है, लेकिन हम नियमों को अपने ऊपर लागू करने के बजाय दूसरों के लिए समझते हैं।
सीट बेल्ट न लगाना, ओवरटेक की होड़, मोबाइल पर बात करते हुए ड्राइविंग – ये सब मिलकर एक्सप्रेस‑वे को डेथ‑वे में बदल देते हैं। हर सर्दी में हज़ारों जानें सिर्फ़ इसलिए चली जाती हैं कि हम “मुझे तो कुछ नहीं होगा” वाली सोच से बाहर नहीं आ पाते।
इस दर्दनाक घटना ने फिर साबित कर दिया कि सिर्फ़ कानून बनाना काफ़ी नहीं, उसे दिल से अपनाना ज़रूरी है। सरकार फ़ॉग‑वार्निंग सिस्टम, स्पीड मॉनिटरिंग कैमरे और जागरूकता अभियान चला रही है, पर ड्राइवर की उँगली अगर एक्सीलेटर से नहीं हटेगी तो कोई तकनीक हमारी जान नहीं बचा सकेगी।
बस और टैक्सी मालिकों को भी चाहिए कि वे अपने ड्राइवरों को समय‑पालन से ज़्यादा जान‑पालन की सीख दें, शेड्यूल इस तरह बनाएँ कि तेज़ी दिखाने पर मजबूरी न हो। स्कूलों से लेकर ड्राइविंग स्कूल तक, हर जगह सड़क सुरक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए ताकि अगली पीढ़ी नियमों को बोझ नहीं, सुरक्षा कवच समझे।
सबसे ज़रूरी बात यह है कि हम हर यात्री, हर ड्राइवर और हर परिवार की पीड़ा को अपना समझें। कल्पना कीजिए, जो लोग कल रात अपने परिजनों को “जल्दी मिलते हैं” कहकर निकले थे, वे आज वापस लौट ही नहीं पाए। यह सोच भर से रूह काँप उठती है।
इस हादसे से हमें सीख लेनी होगी कि धुंध हो या साफ़ मौसम, सड़क पर हर सेकंड की जिम्मेदारी हमारे हाथ में है। जब अगली बार कोहरा छाए और आप एक्सप्रेस‑वे पर हों, तो ब्रेक हल्का सा और ज़मीर थोड़ा सा मजबूत कर लीजिए; गति कम करिए, दूरी बढ़ाइए, क्योंकि घर पर आपका इंतज़ार किसी न किसी को ज़रूर है।
भगवान बद्री, केदार एवं मां गंगा से यही प्रार्थना मृतकों के परिवार को यह असीम दुख सहन करने की शक्ति दे, एवं घायलों को जल्दी से जल्दी स्वास्थ्य लाभ दे।
